Tue, 16 Jun 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

*वृद्ध आश्रम से एक बाप का खत बेटे के नाम*

 


तुम मेरी फिक्र न करना हरगिज़
मैं बहुत खुश हूं बहुत खुश हूं यहां
बात करने के लिए पंछी हैं 
दर्द कहने के लिए दीवारें 
दर्द लिखने के लिए आंसू हैं 
खुदकलमी के लिए तन्हाई 
पहरेदारी के लिए साया है 
कोई दुख है तो बस इतना है कि यहां
फूल खिलते हैं मगर हंसते नहीं 
रात आहिस्ता गुजरती है बहुत 
चांद  ग़मगीन नज़र आता है 
और सूरज के निकलने पर भी  
सुबह धुंधली ही सी नज़र आती है
ख़ैर ... यह रूह की आज़ार हैं सब
जिस्म को कोई भी आज़ार नहीं
मुतमईन है मेरे चरागार भी 
वो भी कहते हैं मैं बीमार नहीं 
तुम मेरी फ़िक्र न करना हरगिज़ 
मैं बहुत खुश हूं बहुत खुश हूं यहां

 


*इक़बाल अशहर*

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