Thu, 30 Jul 2026
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काव्य संकलन "श्रुता"

वही फिर मुझे याद आने लगे हैं

जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं

ख़ुमार बाराबंकवी

 

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

जलील ’आली’

 

ग़ैर तो आँसू पोछेंगे

धोका देंगे अपने लोग

अंजुम बाराबंकवी

 

उम्र गुज़री है मांजते ख़ुद को

साफ़ हैं , बस चमक नहीं पाए....

विशाल बाघ

 

सुब्ह होती है शाम होती है,

उम्र यूँ ही तमाम होती है..!!

~ मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

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