Fri, 31 Jul 2026
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"वसीम बरेलवी" ग़ज़ल

तिरे ग़म से उभरना चाहता हूँ

मैं अपनी मौत मरना चाहता हूँ

 

धधकती आग है साए में जिस के

पसीना ख़ुश्क करना चाहता हूँ

 

ये फ़न इतना मगर आसाँ कहाँ है

ज़रूरत भर बिखरना चाहता हूँ

 

नहीं ढोना ये बूढ़ा जिस्म मुझ को

सवारी से उतरना चाहता हूँ

 

किसी की नब्ज़ पर हो हाथ मेरा

'इलाज अपना ही करना चाहता हूँ

 

तभी मैं मशवरा करता हूँ सब से

जब अपने दिल की करना चाहता हूँ

 

ख़ुदा जाने उसे खोने से 'शारिक़'

मैं डरता हूँ कि डरना चाहता हूँ

 

शारिक़ कैफ़ी

 

 

तहरीर से वर्ना मिरी क्या हो नहीं सकता

इक तू है जो लफ़्ज़ों में अदा हो नहीं सकता

 

आँखों में ख़यालात में साँसों में बसा है

चाहे भी तो मुझ से वो जुदा हो नहीं सकता

 

जीना है तो ये जब्र भी सहना ही पड़ेगा

क़तरा हूँ समुंदर से ख़फ़ा हो नहीं सकता

 

गुमराह किए होंगे कई फूल से जज़्बे

ऐसे तो कोई राह-नुमा हो नहीं सकता

 

क़द मेरा बढ़ाने का उसे काम मिला है

जो अपने ही पैरों पे खड़ा हो नहीं सकता

 

ऐ प्यार तिरे हिस्से में आया तिरी क़िस्मत

वो दर्द जो चेहरों से अदा हो नहीं सकता

 

वसीम बरेलवी

 

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता

 

पहुँचा है बुज़ुर्गों के बयानों से जो हम तक

क्या बात हुई क्यूँ वो ज़माना नहीं आता

 

मैं भी उसे खोने का हुनर सीख न पाया

उस को भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता

 

इस छोटे ज़माने के बड़े कैसे बनोगे

लोगों को जब आपस में लड़ाना नहीं आता

 

ढूँढे है तो पलकों पे चमकने के बहाने

आँसू को मिरी आँख में आना नहीं आता

 

तारीख़ की आँखों में धुआँ हो गए ख़ुद ही

तुम को तो कोई घर भी जलाना नहीं आता

 

वसीम बरेलवी

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