Thu, 30 Jul 2026
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भगवत् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने 10वें अधियाय में अपनी अलोकिक पहचान का वर्णन किया है। योगिराज रमेश जी।

रसोअहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।प्रणवः  सर्ववेदेषु  शब्दः  खे  पौरुषं  नृषु।।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संबोधन करते हुए कहा की हे कुंतीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूँ। सूर्य तथा चंद्रमा का प्रकाश हूँ। वैदिक मंत्रों में ओंकार हूँ। आकाश में ध्वनि हूँ। तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।

 

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