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ओंकार का अर्थ तीसरा नेत्र जागरण
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ओंकार का अर्थ एक सर्वव्यापी ध्वनि से है जो निरंतर विश्व भर में गूंजती रहती है जैसे एक चालू कारखाने में निरंतर एक प्रकार की ध्वनि गूंजती रहती है उसी प्रकार की दृष्टि रचना की अनंत प्रक्रिया से सतत रूप से उत्पन्न होती रहती है जिसका आकार ओम जैसा होता है इसी लिए इसे ओंकार कहा जाता है यह कोई एक देशीय स्वर नहीं है और ना ही इसका कोई अर्थ है यह एक अनहद नाद है जो अनादि और अनंत है जो विश्व की अबाध गति का प्रमाण है
क्या इस ध्वनि को प्रत्यक्ष रूप से सुना जा सकता है? इस ओम के महत्व को भारतीय दर्शन और संस्कृति के माथे पर तिलक की तरह अलंकृत करके रखा गया है मानव निर्मित औद्योगिक सभ्यता से पहले आदिम युग में जब मनुष्य अरण्य वासी हुआ करते थे तब उनकी इंद्रियां प्रकृति से एकाकार रहा करती थी फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो कहता है तब प्रकृति और मनुष्य के स्वभाव में भेद नहीं था नगरीय सभ्यता के आरंभ होते ही एकता टूट गई कारखानों के विकास और मशीन युग के सूत्रपात ने प्रकृति और मानव के घनिष्ठ संबंधों को तोड़ दिया और मनुष्य स्वयं निर्मित सभ्यता के शोर-शराबे में डूब गया वह संवेदनशील ना रहा तार्किक और बौद्धिक होता गया असीम से अलग होकर ससीमऔर संकुचित हो गया प्राकृतिक ध्वनियों प्रति ध्वनियों और मनुष्य के कान के मध्य कल कारखाने की अनवरत ध्वनि ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली जिससे ओम की ध्वनि तो ओट में चली गई कोयल और पपीहे की मधुर ध्वनि भी अनसुनी रहने लगी किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सूर्य बादलों की ओट में चला गया तो सूर्य सदा के लिए विलीन हो गया उसी तरह ओम जो सृष्टि रचना की सतत प्रक्रिया का प्रमाण है वह अविराम और अबाध गति से गतिमान है उससे उसकी सत्ता और महिमा कभी भी खंडित और बाधित नहीं होती बल्कि उस अनंतनाद में मानव निर्मित ध्वनिया उसी तरह समा जाती हैं जैसे नदियां समुद्र में' नदियों का स्वर प्रवाह जब वे अपने मुहाने पर पहुंचती हैं अनसुना हो जाता है तब केवल सागर की दिगंत व्यापी गर्जना ही सुनी जाती है वैसे ही विश्व की सभी प्रकार की ध्वनियां ओम के अनहद नाद में अपनी सत्ता विलीन कर देती है ओंकार ही सर्वव्यापी है और सर्व भक्षी बना रहता है इस रचनात्मक ध्वनि को ब्रह्म ही मान लिया जाता है और यह ब्रह्म ही है आज्ञा चक्र का मूल मंत्र ओम ही है आज्ञा चक्र जागरण के लिए ओंकार की ।साधना कराई जाती है यह तीसरा नेत्र जागृत होने से मानव के सर्वांगीण विकास की संभावना बहुत तीव्र हो जाती है इसलिए तीसरे नेत्र के जागरण के लिए अभ्यास करना बहुत जरूरी है।
-जगद्गुरु आगमाचार्य तांत्रिक योगी श्री रमेश जी महाराज
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