Thu, 30 Jul 2026
Post Details

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं

लोग काँटों से बच के चलते हैं 
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं 
अज्ञात

तुम हँसो तो दिन निकले चुप रहो तो रातें हैं 
किस का ग़म कहाँ का ग़म सब फ़ुज़ूल बातें हैं
अज्ञात

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं 
अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश 
अज्ञात

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
अहमद फ़राज़

सोचो ज़रा कि तुम ने ज़माने को क्या दिया 
क्यूँ सोचते हो तुम को ज़माने से क्या मिला 
अजय सहाब

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
दाग़ देहलवी

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ
अहमद फ़राज़

इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
मिर्ज़ा ग़ालिब

Comments

No comments yet.



Latest News

Number of Visitors - 186715