Thu, 30 Jul 2026
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धनवान व्यक्ति के धन की सार्थकता उसकी दान शीलता में होती है कृपणता में नहीं : योगिराज रमेश जेई

दान चार प्रकार का होता है नित्य नैमित्तिक काम्य और विमल ।

धनवान व्यक्ति के धन की सार्थकता उसकी दान शीलता में होती है कृपणता में नहीं विश्व का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद दसवें मंडल के 117 वे सूक्त मैं कहता है कि याचक को अन्न दान करने वाला धनी है सुख संपदा रथ के पहले की तरह ऊपर नीचे आते जाते रहते हैं धन किसी के पास सदैव नहीं रहता है यह एक के बाद दूसरे को दूसरे के बाद तीसरे को प्राप्त होता रहता है।
        दान चार प्रकार का होता है नित्य नैमित्तिक काम्य और विमल जिस व्यक्ति का अपने ऊपर किसी प्रकार का उपकार न हो उस व्यक्ति को नित्य कुछ दान देने को नित्य दान करते हैं पाप कर्म की शांति के लिए दिया जाने वाला दान नैमित्तिक दान कहा जाता है सुख प्राप्त करने के लिए संतान के लिए ऐश्वर्य भोग के लिए दान देना काम्य  दान कहा जाता है सुंदर चित्त से ईश्वर की प्रसन्नता हेतु अपनी विमल बुद्धि का सहारा लेकर दान देना विमल दान होता है कोई कामना  इस दान में नहीं रहती है प्रभु देता है उसका ज्यादा हिस्सा हम स्वयं उपयोग करते हैं उसमें से थोड़ा दसवां हिस्सा दान करना पुण्य ही पुण्य है जो कुछ भी दान दिया जाए वह श्रद्धा पूर्वक देना चाहिए श्रद्धा विहीन दान का कोई अर्थ नहीं है दान में सदैव लज्जा का भाव होना चाहिए कि मैं तो थोड़े दे रहा हूं सारा कुछ धन तो प्रभु का है जो कुछ दे रहा हूं वह थोड़ा ही है
        सभी प्रकार के दानों में भूमि दान श्रेष्ठ पवित्र और पुण्य दायक है वेद का वचन है सभी दानों में भूदान महान दान है दान देने के लिए धन कमाओ और संग्रह और विलासिता के लिए नहीं 
गौरव दान से प्राप्त होता है वित्त के संचय से नहीं।।

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