Thu, 30 Jul 2026
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अर्थागमों नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।

चिंतायाश्च चितायाश्च बिन्दुमात्रं विशिष्यते |
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति जीवनम् ||

चिंता और चिता इन शब्दों में केवल एक बिन्दु का फ़र्क है चिता निर्जीव शरीर को जलाती है, और चिंता जीवन को ही जलाती है|
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अर्थागमों नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
         वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या षट् जीव लोकेषु सुखानि राजन्।।

 धन, स्वस्थ शरीर, सुरूप सहचारी, प्यारा और मीठा बोलने वाली पत्नी, पुत्र का  आज्ञापालक होना और धन उत्पन्न करने वाली शिक्षा का ज्ञान होना। यही सुख का मूल कारण है।

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