ਨਾਗਰਾ ਫਾਟਕ ਤੋਂ ਰਤਨ ਨਗਰ ਦੇ ਰਸਤੇ ਤੇ ਲਾਈਟਾਂ ਦੋ ਮਹੀਨੇ ਤੋਂ ਖਰਾਬ ਹੋਈਆਂ ਹਨ : ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ ਰਾਣੋ
शोर धीमा पड़ रहा है,
रंग अब थककर दीवारों से लग गए हैं,
गुलाल से सजे चेहरे,
आईने में खुद को ढूंढ रहे हैं।
आंगन में पड़ी पिचकारी,
अब भी किसी की हंसी संभाले है,
बाल्टी के आखिरी कतरे में,
कुछ यादें अब भी भीगी पड़ी हैं।
माँ चौके में गुज़िया पलट रही है,
बाबा अलाव के पास बैठे,
हथेलियों से उड़ते रंगों को
देख मुस्कुरा रहे हैं।
होली ख़त्म नहीं होती,
बस सूखकर हमारी हथेलियों में रह जाती है,
अगले बरस फिर खिलने के लिए…
*कंचन "श्रुता"*





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