Sun, 14 Jun 2026
Post Details

होली की शाम

 

शोर धीमा पड़ रहा है,  

रंग अब थककर दीवारों से लग गए हैं,  

गुलाल से सजे चेहरे,  

आईने में खुद को ढूंढ रहे हैं।  

 

आंगन में पड़ी पिचकारी,  

अब भी किसी की हंसी संभाले है,  

बाल्टी के आखिरी कतरे में,  

कुछ यादें अब भी भीगी पड़ी हैं।  

 

माँ चौके में गुज़िया पलट रही है,  

बाबा अलाव के पास बैठे,  

हथेलियों से उड़ते रंगों को  

देख मुस्कुरा रहे हैं।  

 

होली ख़त्म नहीं होती,  

बस सूखकर हमारी हथेलियों में रह जाती है,  

अगले बरस फिर खिलने के लिए…

 

 

*कंचन "श्रुता"*

Views: 216

Comments & Discussions

Be the first to comment on this article!



Latest News

Number of Visitors - 166586