Thu, 30 Jul 2026
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रंग बदले ज़िन्दगी

 

 

चौखट पे जो धूप बिखरा करती थी,  

अब खिड़की से छनकर आती है।  

गलियों में जो हंसी बिखरती थी,  

अब स्क्रीन पे टाइप हो जाती है।  

 

रंग बदले ज़िन्दगी…  

कभी सुर्ख़ शामों में डूब गई,  

कभी बेरंग सुबहों में जागी।  

जो हाथ थामकर चलते थे साथ,  

अब बस नंबरों में सिमट के रह गए।  

 

कभी बारिश में भीगने का शौक़ था,  

अब छतरी लिए चलते हैं लोग।  

जो खत कभी दिल से लिखे जाते थे,  

अब इमोजी में समेटे ढलते हैं लोग।  

 

रंग बदले ज़िन्दगी…  

पर कुछ रंग अब भी बाकी हैं,  

माँ की दुआओं की खुशबू में,  

पापा की हथेलियों के आशीष में,  

दोस्तों की हंसी की लय में,  

बचपन की किसी गली के मोड़ पर।  

 

और जब कोई पुराना गीत बजता है,  

दिल फिर उसी लय में झूमता है।  

क्योंकि ज़िन्दगी के ढंग बदले हैं,  

पर कहीं न कहीं…  

रंग पुराने भी महकते हैं।  

 

एक सुबह फिर नई हो ,  

जहाँ रिश्ते फिर सच्चे हों ।  

जहाँ हंसी सिर्फ स्क्रीन पर नहीं,  

दिल की गहराइयों में गूंजे।  

जहाँ रंग बदलेंगे… मगर सिर्फ खिलने के लिए।

 

*कंचन "श्रुता"*

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