Thu, 30 Jul 2026
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चाँद

 

चाँद भी कुछ थका-थका सा लगा कल रात,
जैसे किसी की याद में देर तक जागा हो।

बालकनी की सिल पे चुपचाप बैठा था,
ना उजाला ज़्यादा, ना ही अंधेरा पूरा।

मैंने पूछा—"क्या हुआ?"
तो उसने मुस्कुराके कहा,
कुछ भी नहीं… बस आज दिल थोड़ा भारी है।

मैंने चाय रख दी पास में, और कहा 
कभी-कभी बिना वजह भी टूट जाया करते हैं लोग

वो देखता रहा मुझे कुछ पल,  
फिर यूँ चमका, जैसे अंदर कोई दिया जला हो।

रात ढली, चाँद चला गया… मगर जाते-जाते,
मेरे चेहरे पे एक उम्मीद की किरन छोड़ गया।


*कंचन "श्रुता"*

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