Thu, 30 Jul 2026
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हिंदी

 

 यादों से भविष्य तक
हिंदी महज़ कोई लिपि नहीं,
यह मेरे बचपन की वह पहली सीढ़ी है
जहां 'अ' से अनार नहीं,
'अ' से अपनापन सीखा था।
वह दादी की कहानियों वाली जादुई दुनिया,
जिसमें परियां भी हिंदी में ही दुआएं देती थीं।

आज के इस दौर में,
जहां हम अंग्रेजी के भारी शब्दों से
अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं,
वहां हिंदी एक पुराने घर की तरह है।
शायद हम शहर बदल लें, लहजा बदल लें,
पर जब कभी बहुत गहरी चोट लगती है
तो मुँह से सबसे पहले 'माँ' ही निकलता है।

यह भाषा नहीं, हमारा सत्य है।
यह हमें उस 'मैं' के एकांत से बाहर खींचती है,
जहां हम सिर्फ खुद के लिए जीते थे,
और खड़ा कर देती है 'हम' के उस चौराहे पर
जहाँ चाय की टपरी से लेकर संसद की बहस तक,
हर दिल की धड़कन एक ही लय में बजती है।
क्योंकि हिंदी सिर्फ़ बोली नहीं जाती,
यह जी जाती है।


*कंचन "श्रुता"*

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