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News Riders Tv: राज्यसभा में राघव चड्ढा ने स्वास्थ्य सेवाओं पर जो कड़वा सच पेश किया है, वह यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर एक आम नागरिक की जान की कीमत क्या है? सरकार का खुद का यह लक्ष्य रहा है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी (GDP) का 2.5 प्रतिशत होना चाहिए, लेकिन विडंबना देखिए कि साल 2026 में भी हम मात्र 0.5 प्रतिशत पर ही अटके हुए हैं।
जब हम अपनी तुलना दुनिया के बाकी देशों से करते हैं, तो तस्वीर और भी डरावनी लगती है। जहाँ अमेरिका अपनी जीडीपी का 18 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है, यूके में यह 12 प्रतिशत है और जर्मनी में 13 प्रतिशत है, वहीं हमारी प्राथमिकताएं कहीं पीछे छूट गई हैं। इन विकसित देशों को पता है कि एक स्वस्थ नागरिक ही एक मज़बूत देश का निर्माण करता है।
बजट की इसी कमी का सीधा असर हमारे सरकारी अस्पतालों पर दिखता है, जिन्हें भारतीय स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। आज वहां आपको पुरानी और जर्जर इमारतें मिलेंगी, अस्पतालों में कर्मचारियों की भारी कमी है और डॉक्टर काम के बोझ से बुरी तरह दबे हुए हैं।
न जाँच के लिए पर्याप्त मशीनें हैं, न दवाइयां और न ही जनसंख्या के अनुपात में बिस्तरों (beds) की उपलब्धता है। हालात इतनी चिंताजनक हैं कि यदि किसी तरह ऑपरेशन की तारीख मिल भी जाए, तो वह इतनी दूर की होती है कि तब तक कई मरीज दम तोड़ देते हैं।
जीडीपी का मात्र 0.5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य को देना क्या वाकई 140 करोड़ की आबादी के साथ न्याय है? जब तक हम अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक विकास के बड़े दावों का कोई मोल नहीं है।
क्या आपने कभी किसी सरकारी अस्पताल की बदहाली को करीब से देखा है? क्या आपको लगता है कि टैक्स देने के बाद भी हमें वैसी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं जैसी मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें।????????
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