ਨਾਗਰਾ ਫਾਟਕ ਤੋਂ ਰਤਨ ਨਗਰ ਦੇ ਰਸਤੇ ਤੇ ਲਾਈਟਾਂ ਦੋ ਮਹੀਨੇ ਤੋਂ ਖਰਾਬ ਹੋਈਆਂ ਹਨ : ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ ਰਾਣੋ
1957 का साल भारतीय फ़िल्म इतिहास के सबसे सुनहरे सालों में शुमार है. यक़ीन ना हो तो इस साल की फ़िल्मों को देख लीजिए.
इसी साल 'मदर इंडिया' आयी थी, जिसे आज तक ब्लॉकबस्टर मूवी माना जाता है. इसी साल दिलीप कुमार के 'नया दौर' का जादू देखने को मिला था और गुरुदत्त की क्लासिक 'प्यासा' भी इसी साल प्रदर्शित हुई थी.
तीन सदाबहार हिट फ़िल्मों के बीच भारतीय सिनेमा को एक नया सितारा भी इसी साल मिला था. शम्मी कपूर के चार साल के संघर्ष और 19 फ़िल्मों की नाकामी का सिलसिला इसी साल थमा था. आमिर ख़ान के चाचा नासिर हुसैन के निर्देशन में बनी शम्मी कपूर ने 'तुमसा नहीं देखा' ने हंगामा मचा दिया था.
ये हंगामा कैसे और क्यों मच गया था, इस पर बात आगे बढ़ाने से पहले ये जानना दिलचस्प है कि शम्मी कपूर इस फ़िल्म से पहले नाकामी के उस बियाबां में थे जहां से उन्होंने फ़िल्मों को अलविदा कहकर असम के चाय बगानों में मैनेजरी करने का मन बना लिया था.
ऐसा होने की वजहें भी थीं, कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे कोई दूसरा पेड़ नहीं पनपता. शम्मी कपूर का सामना तो तीन-तीन विशाल बरगदों से था. परिवार के अंदर और परिवार के बाहर भी.





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