Thu, 18 Jun 2026
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विज्ञापन ठेका : दस साल से नहीं लगा, निगम को 100 करोड़ से अधिक का नुकसान निगम कंगाल : कौन हो रहा मालामाल ? पढ़े पूरी खबर

विज्ञापन ठेका : दस साल से नहीं लगा, निगम को 100 करोड़ से अधिक का नुकसान

निगम कंगाल : कौन हो रहा मालामाल ?

पढ़े पूरी खबर

 

जालंधर (राजन) : सरकारी फाइलों में सिर्फ पब्लिक के काम ही नहीं अटकते, सरकारी काम भी फंस जाते हैं। जालंधर शहर में विज्ञापन ठेके की फाइल करीब 10 साल से अटकी है। इससे निगम को अब तक 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। कभी पंजाब स्तर पर नई पालिसी तो कभी स्थानीय स्तर पर टेंडर प्रक्रिया में बार-बार फेरबदल से 10 साल से ज्यादा का समय निगम गया। निगम को कई साल से यह नुकसान उठाना पड़ रहा है। निगम हमेशा कंगाली में रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि इन पैसों से कौन मालामाल हो रहा है।

किसी ने भी विज्ञापन ठेके से निगम का राजस्व बढ़ाने की कोशिश नहीं की। शहर में बिना मंजूरी विज्ञापन लगाए जा रहे हैं लेकिन निगम के अकाउंट में कुछ नहीं आ रहा। अब मेयर वनीत धीर ने सरकार से टेंडर के लिए नए सिरे से मंजूरी ली है। मेयर पद संभालने के बाद से ही उन्होंने विज्ञापन ठेके के टेंडर पर काम शुरू कर दिया था।

सरकार ने टेंडर राशि बढ़ा कर 18 करोड़ कर दी थी लेकिन अब मेयर ने सरकार से टेंडर राशि कम करने की मंजूरी ली है। सरकार ने 15 से 25 प्रतिशत राशि कम करने की मंजूरी दी है। नए प्रस्ताव को हाउस में पास करके टेंडर लगाया जाएगा।

मेयर को उम्मीद है कि यह टेंडर सिरे चढ़ जाएगा और निगम को हर साल 15 करोड़ रुपए के लगभग आय होगी। इस समय सिर्फ माडल टाउन जोन में 59 यूनिपोल साइट्स की बुकिंग कर रहा है। यह साइट्स काफी डिमांड में रहती हैं और इनकी तीन महीने के लिए एक साथ बुकिंग की जाती है। नए ठेके में करीब 250 यूनिपोल साइट्स होंगी जिसमें पुराने ठेके के 59 यूनिपोल भी शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त बस क्यू शेल्टर, पब्लिक टायलेट्स समेत कई अन्य साइट्स पर भी विज्ञापन लगाने की मंजूरी होगी।

 

माडल टाउन समेत कई इलाकों में लगी हैं स्क्रीन

विज्ञापन ठेका न होने का फायदा बिजनेसमैन उठा रहे हैं। पहले होर्डिंग-बैनर लगाए जाते रहे हैं लेकिन अब बड़ी-बड़ी स्क्रीन लगाई जा रही हैं। ऐसी स्क्रीन के लिए मंजूरी ली जाए तो हर महीने लाखों रुपये किराया बनता है। अब यह पैसा किसके खाते में जा रहा है, पता नहीं। निगम को कई साल से यह नुकसान उठाना पड़ रहा है। मेयर जगदीश राजा के कार्यकाल में भी टेंडर को रोका गया था।

 

सरकार की लापरवाही से कई साल की देरी

नगर निगम ने साल 2005-06 में डीएवी फ्लाईओवर निर्माण करने वाली कंपनी को बीओटी के आधार पर 11 साल के लिए शहर में विज्ञापन का ठेका दिया था। इस वीच निगम ने कई नई विज्ञापन साइट्स भी तय कर ली। निगम ने नए टेंडर की तैयारी की तो पुरानी कंपनी कोर्ट चली गई और घास होने का दावा करके समय बढ़ाने की मांग की। हालांकि कोर्ट से निगम को राहत मिल गई लेकिन कंपनी ने मुआवजा का दावा किया हुआ है। चहीं साल 2018 में कांग्रेस सरकार वनने पर तत्कालीन लोकल वाडी मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने नई पॉलिसी तैयार की। पालिसी में नए ठेके की राशि काफी बढ़ा दी गई जिससे ठेका सिरे नहीं चढ़ पाया। पंजाब स्तर पर पालिसी में बदलाव के बाद यह मामला जालंधर नगर निगम स्तर पर लटका रहा। कभी शहर के चार टेंडर तो कभी दो टेंडर लगाने के वीच ही विवाद चलता रहा। कांग्रेस सरकार के वाद आप सत्ता में आई तो नगर निगम में हाउस खत्म हो गया। हाउस न होने की वजह से दो साल तक टेंडर फंसा रहा। करीब 9 महीने वाद हाउस बना तो नए मेयर वनीत धीर ने इसके लिए प्रयास शुरू किए हैं। सरकार ने टेंडर राशि 12 करोड़ से बढ़ाकर 18 करोड़ कर दी थी जिस वजह से छह महीने से टेंडर रुका हुआ है। मेयर ने सरकार को टेंडर का रेट कम करने का प्रस्ताव भेजा था। सरकार ने 3 सदस्य बनाने के बाद 15 से 25 प्रतिशत रेट कम करने की मंजूरी दी है और अब उम्मीद है कि टेंडर सिरे चढ़ जाएगा।

 

जिम्मेदार कौन ? 

निगम का खाता खाली रहता है। समय से कर्मचारियों को सैलरी तक नहीं मिल पाती है। ऐसे में बढ़ा बढ़ा सवाल है कि इतने लंबे समय से आखिर विज्ञापन का ठेका देने की पहल क्यों नहीं सिरे चढ़ पा रही है। कहीं इसके पीछे विज्ञापन माफिया तो सक्रिय नहीं है। यदि कोई व्यक्ति कहीं पर छोटा सा निर्माण शुरू करता है तो निगम कर्मचारी वसूली के लिए पहुंच जाते हैं। ऐसे में जब पूरा शहर विज्ञापन से भरा पड़ा है, तो ऐसा हो नहीं सकता कि इसकी वसूली नहीं की जा रही हो। बढ़ा सवाल है कि आखिर इसका पैसा किसके खाते में जा रहा है।

क्या इसके पीछे माफिया और अफसरों की मिलीभगत तो नहीं?

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