ਨਾਗਰਾ ਫਾਟਕ ਤੋਂ ਰਤਨ ਨਗਰ ਦੇ ਰਸਤੇ ਤੇ ਲਾਈਟਾਂ ਦੋ ਮਹੀਨੇ ਤੋਂ ਖਰਾਬ ਹੋਈਆਂ ਹਨ : ਰਣਜੀਤ ਕੌਰ ਰਾਣੋ
तिरे ग़म से उभरना चाहता हूँ
मैं अपनी मौत मरना चाहता हूँ
धधकती आग है साए में जिस के
पसीना ख़ुश्क करना चाह...
एक दौर था, जब गगन हंसता था,
बादलों की टोलियाँ खेला करती थीं,
तारों की महफ़िलें सजी रहती थीं,
चाँ...
सुब्ह जब आए,
तो खिड़की पे रख जाए , कुछ धूप के सुनहरे टुकड़े …
हवा चलते-चलते कानों में
पुराने किस...
ये मरना जीना भी शायद मजबूरी की दो लहरें हैं
कुछ सोच के मरना चाहा था कुछ सोच के जीना चाहा है
सहर अंसा...
कोमल हथेलियों में सपनों की लकीर थी,
आँखों में उजाले की तासीर थी...
पर जब दुनिया के रं...
तू हर इक का है और किसी का नहीं
लोग कहते रहें हमारा चाँद
अतहर नादिर
पलट के आ गई ख़ेमे की सम्त प्यास मिरी
<...छुरी का तीर का तलवार का तो घाव भरा
लगा जो ज़ख़्म ज़बाँ का रहा हमेशा हरा
इस्माइल मेरठी
अजीब शख़्स था उस को समझना मुश्किल है
किनार-ए-आब खड़ा था मगर वो प्यासा था
खलील तनवीर
मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई
आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में
आलम ख़ुर्शीद
हिज्र की र...
जो भी चाहो निकाल लो मतलब
ख़ामुशी गुफ़्तुगू पे भारी है
मसरूर जालंधरी
तुम्हें हँसते हुए देखा है जब से
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